Monday, November 22, 2010

ताजमहल में मुमताज़ नहीं है....

tHIS poem i have written on seeing someone beautiful face.


no she is not my RED HOUSE

I love my house, but the girl next door from pakistan.

dont know but 1 snap of hers made me write this lines.

neither the poet is a shanjanhan nor he is looking for any mumtaz.

its only imagination where the poet says that its been years i saw such a face.

mam u know that i ahve written this on you, since i have already commented on ur picture comments

आज समझा मोहब्बत की सबसे बड़ी निशानी

आज समझा मोहब्बत की सबसे बड़ी निशानी

मेरे वतन का ताजमहल अब तक मेरे वतन में ही है



मेरे वतन का ताजमहल अब तक मेरे वतन में ही है

शायद शहाजहां भी यहीं कहीं है

शायद शहाजहां भी यहीं कहीं है



मगर अब यहाँ मुमताज़ नहीं है

अब यहाँ मुमताज़ नहीं है.....



दो बार जंग जीत के भी क्या फायदा

दो बार जंग जीत के भी क्या फायदा

हमारे वतन में कोई ऐसी अब मुमताज़ नहीं है..

हाँ शायद हमारे वतन में कोई ऐसी मुमताज़ नहीं है..



आगरा भी यहीं

ताज भी यहीं

महल भी है...

शाहजहाँ भी यहीं कहीं...

पर अब शायद वहाँ,कोई मुमताज़ नहीं है...



चले गए हमको अब रुसवा करके

क्या हमारे वतन में एक भी ऐसी मुमताज़ नहीं है....!

क्या हमारे वतन में एक भी ऐसी मुमताज़ नहीं है....!

जंग जीत के भी क्या फायदा...

जब ताजमहल में मुमताज़ ही नहीं है....



-प्रवीण इलाहाबादी व महक सुल्ताना

To Be continued.............

POET- PARVIN ALLAHABADI &; MEHEK SULTANA


( there can be thousand of Mehek Sultana)

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